Friday, June 29, 2007

हर तरफ़, हर तरह...

बुलबुलों में रहा पिंजरों की तरह,
रास्तों पर चला मंजिलों की तरह,
मैं नशे में भी होश ना खो सका
महफ़िलों को जिया मंदिरों की तरह,
सपने हकीकत सब बेकार थे
इस सजा को जिया शापितों की तरह,
शौक था एक ही बस बगावत का
फ़ौजियों में रहा बागियों की तरह,
नाम था या थी ये सब बदनामियाँ
खबरों में रहा हादसों की तरह,
ठहरे पानी सा ही यूं तो ठहराव था
नफ़रतों में चला पर गोलियों की तरह,
हरेक का यहाँ कोई खरीददार था
मैं फ़ेरियों में बिका फ़ुटकरों की तरह,
इश्क़ को क्यों इबादत कहते हैं लोग
खाइयों में गिरा आशिक़ों की तरह,
दूंद ली भीड़ में भी मैंने तनहाइयां
शादियों में रहा मातमों की तरह,
हार को चूमा हर बार बहुत प्यार से
हौसलों से मिला मुश्किलों की तरह,
दर्द की वजह बस एक इन्तज़ार था
हर घड़ी से मिला दुश्मनों की तरह,
हर मोड़ पर एक ऊंची दीवार थी
झांका दरारों से कनखियों की तरह,
दिल से मिटाया मेरा नाम बार बार
उनके गालों पर रहा सुर्खियों की तरह,
मैं गूंगा था
उन्हे शौक था शोर का
बस बिलखता रहा
जोकरों की तरह,
ये लिखना तो बस एक दोहराव था
बस उन्हीं को लिखा
हर तरफ़, हर तरह...